रिपोर्ट एस कुमार
रांची/रामगढ़। आज रांची एयरपोर्ट पर ओशो अनुज स्वामी शैलेंद्र सरस्वती एवं मां प्रिया का आगमन हुआ। सैकड़ों भक्तों ने बुके एवं माल्यार्पण कर उनका स्वागत किया। एयरपोर्ट का माहौल पूरी तरह भक्ति के वातावरण में परिवर्तित हो गया।
इसके पश्चात काफिला रामगढ़ के शहनाई बैंक्वेट हॉल, केथा मंदिर मौसी बड़ी के पास पहुँचा, जहाँ दूर-दराज से आए सैकड़ों साधकों ने पुष्पवर्षा कर उनका भव्य स्वागत किया। कार्यक्रम अपने निर्धारित समय पर आरंभ हुआ।
शाम 5:30 बजे स्वामी शैलेंद्र सरस्वती, मां प्रिया, आचार्य प्रभाकर जी, डॉ. सीमा रश्मि जी एवं स्वामी दिगंबर जी मंच पर विराजमान हुए। स्वामी शैलेंद्र जी को मां दीपा ने पुष्पमाला अर्पित की, मां प्रिया को मनोज जी ने बुके प्रदान किया। आचार्य प्रभाकर जी को श्री श्याम जी, डॉ. सीमा रश्मि जी को कमल बगड़िया तथा स्वामी दिगंबर जी को अजय जी द्वारा बुके, माल्यार्पण एवं दुपट्टा उड़ाकर सम्मानित किया गया। इसके बाद बच्चों द्वारा स्वागत गीत प्रस्तुत किया गया।
मां दीपा एवं स्वामी मनोज जी ने स्वागत संबोधन किया, तत्पश्चात मंच संचालन की जिम्मेदारी कमल बगड़िया को सौंपी गई। मां प्रिया एवं स्वामी शैलेंद्र सरस्वती द्वारा दीप प्रज्वलन किया गया। तीनों आचार्यों के संबोधन के उपरांत मां प्रिया का उद्बोधन हुआ। अंत में, जिसका सभी साधकों को बेसब्री से इंतजार था, परम गुरु ओशो के अनुज स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने ध्यान को अत्यंत सहज बताते हुए कहा कि जब मन और तन से हम कुछ नहीं करते, तभी ध्यान में प्रवेश होता है।
उन्होंने बताया कि ओंकार के माध्यम से काम, क्रोध और मोह से मुक्ति संभव है। स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने ओशो विचारधारा की सरल व्याख्या करते हुए कहा कि साधना के बाद साधक आनंद के सागर में डूब जाता है, जैसे बूंद सागर में मिलकर सागर ही बन जाती है। तीन दिवसीय इस कार्यक्रम में मन की क्रियाओं में सकारात्मक परिवर्तन आता है और जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है।
कार्यक्रम में किसी कठिन नियम का पालन नहीं कराया जाता। उत्सव और संगीत के माध्यम से भी परमात्मा को पाने की शिक्षा दी जाती है। “उत्सव आमार जाति, आनंद आमार गोत्र” की विधि को अपनाते हुए हँसते-गाते, नाचते हुए ध्यान में प्रवेश कराया जाता है। स्वामी शैलेंद्र सरस्वती ने बताया कि ओशो के लगभग साढ़े छह सौ प्रवचन संकलित होकर पुस्तकों के रूप में उपलब्ध हैं। उन्होंने काम की शक्ति को राम की शक्ति से जोड़ते हुए कहा कि काम से मुक्त होकर ही राम में जीवन संभव है। कार्यक्रम के अंत में संगीत एवं उत्सव का आयोजन हुआ। धन्यवाद ज्ञापन के बाद भोजन प्रसाद का वितरण किया गया, तत्पश्चात साधकगण विश्राम हेतु प्रस्थान कर गए।


