कामाख्या मंदिर के बाद दुनिया का सबसे विख्यात शक्तिपीठ मां छिन्नमस्तिका मंदिर
रिपोर्ट: कृष्णा करमाली
चितरपुर। भैरवी और दामोदर नदी के संगम पर स्थित मां छित्रमस्तिका मंदिर असम के कामाख्या मंदिर के बाद दुनिया के सबसे विख्यात के रूप में हैं। रजरप्पा का यह सिद्धपीठ केवल एक मन्दिर के लिए ही विख्यात नहीं है, बल्कि इस मंदिर के अलावा ना यहां महाकाली मंदिर, सूर्य मंदिर, दश महा-विद्या मंदिर, बाबा धाम मंदिर, शंकर मंदिर और विराट रूप मंदिर के नाम से कुल सात मंदिर हैं।
मंदिर की उत्तरी दीवार के साथ रखे ने एक शिलाखंड पर दक्षिण की ओर मुख किए मां छिन्नमस्तिका का दिव्य रूप अंकित है। मां छिन्नमस्तिका मंदिर के अंदर स्थित शिलाखंड में मां की तीन आंखे हैं। बायां पाँव (पैर) आगे की ओर बढ़ते हुए वे कमल पुष्प खड़ी है। पाँच (गैर) के नीचे उल्टी मुद्रा में कामदेव और रती सोए हुए हैं। मां छिन्नमस्तिका के गले में ये सांपों की और मुंडों की माला सुशोभित हैं। मंदमंदिर का मुख्य द्वार पूर्वमुखी हैं। मंदिर के सामने बलि का स्थान है।
इस स्थान पर रोज 100-200 बकरों की बलि दी जाती हैं। मंदिर के निर्माण काल के बारे में पुरातात्विक विशेषज्ञों में मतभेद है। कई विशेषज्ञ का कहना है कि इस मंदिर का निर्माण 6000 साल पहले हुआ था और कई इसे महाभारतकालीन का मंदिर बताते हैं। मान्यता की उस समय यह मंदिर स्वयं अस्तित्व में आया था। हालांकि हाल के वर्षों में इसमें कई निर्माण किए गये है।

एक राजा और उसकी पत्नी के नाम पर पड़ा रजरप्पा
मां छित्रमस्तिके की महिमा को कई पुरानी कथाएं प्रचलित हैं। प्राचीनकाल में छोटानागपुर में रज नामक एक राजा राज करते थे। राजा की पत्नी का नाम रूपमा था। इन्हीं दोनों के नाम से इस स्थान का नाम रजरूपमा पड़ा, जो बाद में रजरप्पा हो गया। शिलाखंड पर प्रतिमा अंकित दिखने का आया था सपनाः राजा को देखकर वह कन्या कहने लगी है राजन, में छिन्नमस्तिके देवी हूँ। मैं तुमों वरदान देती हूँ कि आज से ठीक नौवें महीने तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी। देवी बोली है राजन् मिलन स्थल के समीप तुमों मेरा एक मंदिर दिखाई देगा।

इस मंदिर के अंदर शिलाखंड पर मेरी प्रतिमा अंकित दिखेगी. तुम सुबह पूजा कर बलि चढ़ ओ। ऐसा कहकर छिन्नमस्तिके अंतध्याने हो गई। इसके बाद से ही यह पवित्र तीर्थ रजरप्पा के रूप में विख्यात हो गया। राजा को स्वप्न में दिखी थी कन्या एक कथा के अनुसार एक बार पूर्णिमा की रात में शिकार की खोज में राजा दामोदर और भैरवी नदी के संगमस्थल पर पहुंचे। रात्रि विश्राम के दौरान राजा ने स्वप्न में लाल वस्त्र धारण किए तेज मुख मंडल वाली एक कन्या देखी।
उसने राजा से कहा है राजन इस आयु में संतान न होने से तेरा जीवन सुना लग रहा है. मेरी आज्ञा मानोगे तो रानी की गोद भर जाएगी. राजा की आँख खुली तो वे इधर-उधर भटकने लगे। इस बीच उनकी आँखे स्वप्न में दिखी कन्या से जा मिली। वह कन्या जल के भीतर से राजा के सामने प्रकट हुई. उसका रूप अलौकिक था यह देख राजा भयभीत हो उठे।

-मान्यता
लोगों का मानना है कि यहां पर मांगी गई मनोकामना जरूर पूरी होती है। लोगों को मनोकामना जब पूरी हो जाती है तो बकरे की बलि भी लोग देते हैं।
-कई मायनों में अद्भुत है रजरप्पा
पुजारी लोकेश पंडा एवं छोटू पंडा के अनुसार मां छिन्नमस्ता देवी की पूजा खासतौर से शत्रुओं पर जीत प्राप्त करने के लिए की जाती है। मां का रूप उग्र है। इसलिए तंत्र मंत्र कि क्रियाओं में भी इनकी पूजा करने की परंपरा है। इन्हें बलि चढ़ाकर और तंत्र साधना के जरिए भक्त अपनी मनोकामना को पूरी करते हैं।
-कैसे पहुंचे माता का दरबार
छिन्नमस्तिका मंदिर से निकट एयरपोर्ट रांची में लगभग 80 किमी की दूरी पर स्थित है। रांची किराए पर ले सकते हैं या रजरप्पा के लिए बस पकड़ कड़ सकते हैं। जहां मंदिर स्थित है। सुबह से शाम तक मंदिर पहुंचने के लिए बस, टैक्सियां एवं ट्रैकर उपलब्ध है। ट्रेन से रजरप्पा पहुंचने का सबसे अच्छा तरीका रामगढ़ रेलवे स्टेशन के लिए सीधी ट्रेन है जो मंदिर से लगभग 28 किमी की दूरी पर स्थित है।
स्टेशन से, आप रजरप्पा के लिए सीधी बस या सीधी टैक्सी किराए पर ले सकते हैं। वही छिन्नमस्तिका मंदिर बस या अपने वाहन से भी आसानी से (सड़क मार्ग) पहुंचा जा सकता है। इधर, मंदिर में देवी मां के दर्शन करने के अलावा, आप रजरप्पा शहर की सुंदरता भी देख सकते हैं।
दामोदर-भैरवी संगम स्थल
यहां देखने लायक है, जो एक अन्य प्रमुख आकर्षण है। आप मंदिर आसपास के क्षेत्र में भैरवी और दामोदर नदियों के संगम का भी आनंद ले सकते हैं।


