रिपोर्ट आरिफ कुरैशी
रामगढ़। झारखंड के रामगढ़ जिले के मांडू प्रखण्ड अंतर्गत में स्थित तोपा गाँव की निवासी रंजू देवी (पति विजय कुमार मुंडा) का जीवन कभी अभावों और सामाजिक उपेक्षा के बीच बीतता था। परिवार के भरण-पोषण के लिए उनके पति दिन-रात मेहनत करते थे, फिर भी उतनी आय नहीं हो पाती थी जिससे घर की बुनियादी जरूरतें पूरी हो सकें। आर्थिक तंगी के कारण परिवार का गुजारा करना कठिन हो रहा था।
रंजू देवी के पास भी कोई विकल्प नहीं बचा था, जिसके कारण उन्हें मजबूरी में हड़िया और दारू बेचने जैसा काम चुनना पड़ा। लेकिन इस काम से उन्हें समाज में मान सम्मान नहीं मिलता था जिसकी वे हकदार थीं। हर दिन एक नई चुनौती थी और आमदनी इतनी अनिश्चित थी कि बच्चों के भविष्य को लेकर रंजू देवी हमेशा चिंतित रहती थी और नयी व्यवसाय की तलाश में थी।
रंजू देवी के जीवन में नया मोड़ तब आया जब वर्ष 2016 में उन्होंने ‘नव जागृति महिला स्वयं सहायता समूह (एसएचजी)’ से जुडी। समूह की साप्ताहिक बैठकों में भाग लेने के दौरान उन्हें न केवल बचत की महत्व समझ आई, बल्कि उन्हें सरकार की विभिन्न जन-कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी भी मिलने लगी। यहीं उन्हें ‘फूलो-झानो योजना’ के बारे में पता चला, जिसका मुख्य उद्देश्य वैसी महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका से जोड़ना है जो पहले हड़िया-दारू की बिक्री में संलग्न है।
इस योजना के तहत 50,000 रुपये तक का ब्याज मुक्त ऋण मिलता है, जो उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं था। समूह की दीदियों के प्रोत्साहन और फूलो-झानो योजना के लाभ से प्रेरित होकर रंजू देवी ने अपना पुराना काम छोड़ने का साहसी निर्णय लिया। उन्होंने सबसे पहले समूह से 10,000 रुपये का ऋण लिया। इस छोटी सी पूंजी से उन्होंने गाँव के पास ही फास्ट फूड का स्टॉल लगाना शुरू किया। शुरुआत में थोड़ी झिझक थी, लेकिन मन में सम्मान के साथ जीने की तीव्र इच्छा थी।
कुछ समय बाद, काम को विस्तार देने के लिए उन्होंने दूसरा ऋण (सीआईएफ) 20,000 रुपये, कुल 30000 रुपये का ऋण लिया और सभी प्रकार के फ़ास्ट फूड जैसे चौमिन, चिल्ली, अंडा रोल ईत्यादी चीजो की सुविधा उपलब्ध की। अब उनका स्टॉल पूरी तरह से जम चुका था और लोग उनके बनाए चाउमीन, समोसे और अन्य पकवानों के स्वाद के कायल होने लगे थे। रंजू देवी के कड़े परिश्रम और ईमानदारी का फल जल्द ही मिलने लगा।
जो महिला कभी चंद रुपयों के लिए अपमानजनक काम करने को मजबूर थी, आज वह अपने व्यवसाय से हर महीने 12,000 से 15,000 रुपये एवं सलाना लगभग 200000 रुपये तक की आय प्राप्त कर रही हैं। व्यवसाय के प्रति उनकी निष्ठा इतनी थी कि उन्होंने लिए गए 10,000 रुपये के ऋण को समय पर सफलतापूर्वक चुका भी दिया है। आज उनकी दुकान न केवल उनकी आय का जरिया है, बल्कि उनके स्वाभिमान का प्रतीक भी बन गई है। आज रंजू देवी की पहचान बदल चुकी है।
अब वे समाज में एक सफल उद्यमी के रूप में जानी जाती हैं। उनकी इस आय ने उनके परिवार को एक सुरक्षित भविष्य दिया है। अब वे अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में भेज रही हैं ताकि उनके बच्चों को कभी उन कठिनाइयों का सामना न करना पड़े जो उन्होंने देखी हैं। रंजू देवी की यह कहानी केवल एक व्यक्ति की सफलता नहीं है, बल्कि यह उन हज़ारों महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो विपरीत परिस्थितियों में फंसी हुई हैं। उनकी यात्रा साबित करती है कि यदि सही जानकारी, सरकारी सहायता और खुद पर विश्वास हो, तो कोई भी महिला अपनी तकदीर खुद बदल सकती है।


