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झारखंडी संस्कृति का धरोहर है भादो एकादशी का करमा पर्व

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प्रो निरंजन महतो
रजरप्पा। चितरपुर कॉलेज के खोरठा विषय के व्याख्याता प्रो निरंजन महतो ने करम पर्व झारखण्ड का लोकप्रिय त्यौहार है परम्परा से जुडा सांस्कृतिक धरोहर है। करम पर लेख प्रस्तुत की है। झारखण्ड की लोक-संस्कृति का सबसे उज्ज्वल और प्राणवान पर्व है करम पर्व। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामूहिक उत्साह, गीत-संगीत और नृत्य का अद्वितीय संगम है। भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाने वाला यह पर्व गाँव–गाँव में लोकजीवन की धड़कन बनकर गूँज उठता है।

करमइतिन और जावा जगाना

करम पर्व की आत्मा हैं करमइतिनें—गाँव की अविवाहित कन्याएँ और बच्चियाँ, जो पूरे श्रद्धाभाव से इस अनुष्ठान की उपासिका बनती हैं। एकादशी से तीन, पाँच अथवा सात दिन पूर्व वे नदी-नालों के तट पर जाती हैं। स्नान-ध्यान के पश्चात बालू से भरी टोकरियों में धान, गेहूँ, मक्का आदि के बीज बोकर लाती हैं। इन्हें जावा कहा जाता है। संध्या समय ये करमइतिनें अपनी-अपनी जावा डाली को लेकर गाँव के अखरा पहुँचती हैं। वहाँ वे गोल घेरा बनाकर घूम-घूम कर गीत गाती हैं। इस प्रक्रिया को जावा जगाना कहा जाता है। यही लोकगीत, करम पर्व की आत्मा कहलाने वाले जावा गीत हैं।

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जावा गीत : भाव और अभिव्यक्ति

जावा गीतों में लोकजीवन के विविध रंग—भाई-बहन का स्नेह, मायके–ससुराल की स्मृतियाँ, सुख-दुःख की छाया और देवताओं के प्रति आस्था—सब एक साथ गूँजते हैं। इन गीतों का स्वर करुण होते हुए भी अत्यंत भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी होता है।

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लोकगीत कुछ इस तरह हैं

(1)
छोटे मोटे कुंदरू गाँव मांझे ठिन अखरा गो
तहीं तरे सभे देवा खेले जुआ साइ किआ
तोहे सुरुज देवा खेले जुआ साइ गो
तोअर गइआ हो देवा कांस नदीक पार जांइ दे हो
जाइ दे हो कांस नदीक पार गो
हवतइ संकट देवा आनबइ घुराइ।

(2)
एति-एति जावा, किआ-किआ जावा
जावा जागलो माइ दाना बहुरवइ से हो रे जावा
एक पाता सरसे सुइया रकम जावा
डाले भोरि गेलइ राड़ मोरइबइ
माइ सुधरा जिअइबइ सरभोर
दहके पनिया पिअइबइ।
(3)
आगू बंधना बांधु सूरूज देवा गो
तबे ओखर बंधना जावा डाली गो
पोखरीक भिड़ि जावा जगइलों गो
एगो के जाने कोन देवा अइता गो
एते जोदि जानतली सुरुज देवा अइता गो
एगो चरक पांठा राखतली बइसाइ गो
तबे बंधना बांधू करम गोसांइ गो
एगो ओखर बंधना जावा डाली गो
एते जोदि जान तली करम गोसांइ अइता गो
एगो खीरा ओंकरी राखतली बइसाइ।।

इन गीतों में प्रकृति, आस्था और सामाजिक रिश्तों की गहरी छाप दिखाई देती है। गांव के अखरा में सभी देवताओं को आमंत्रित करके उनकी आराधना की जा रही है । इन जावा गीतों की ख़ासियत यह है कि इसमें किसी बाध्य यंत्र की जरूरत नहीं होती है। बिना ढोल नगाड़े शहनाई के ये गीत कर्णप्रिय और भावपूर्ण होती है।

करम पूजा की विधि-विधान

एकादशी के दिन करमइतिनों के भाई तथा गाँव का पहान (पुजारी) जंगल से करम की डाली लाते हैं। संध्या समय यह डाली गाँव के अखरा में गाड़ी जाती है। दीपमालाओं और जावा डालियों से घिरे करम अखरा में लोकजीवन की आस्था का अद्भुत दृश्य निर्मित होता है।गाँव का पहान अथवा जेठ रैयत करम कहनी का वाचन करता है। इसमें मुख्यतः करमा- धरमा की कथा को सुनाया जाता है।करमइतिनें धान के पत्ते और फूल करम गोसांइ को अर्पित करती हैं। इसके उपरांत सामूहिक प्रार्थना और गीतों के बीच पूजा सम्पन्न होती है। पूजा के बाद अंकरी बटरी (अंकुरित बीजों का प्रसाद) का वितरण किया जाता है।

झुमर गीत और नृत्य : उल्लास का उत्सव

करम पूजा सम्पन्न होते ही युवक-युवतियाँ करम डाली के चारों ओर झूम उठते हैं। उनके कदमों की थाप और गीतों की गूँज से गाँव का वातावरण उल्लास से भर उठता है। यह सामूहिक नृत्य झुमर कहलाता है, और इसके गीत जीवन की उमंग, प्रेम और सौंदर्य का प्रतीक माने जाते हैं।

करमा लोकगीत के बोल को देखें

(1)
नदिआ ऊ पारे गोरि रास झुमइर लागल भारी
रास झुमइर कइसे देखे जइबइ रे गुइआ
दुइओ कुल भोरल नदिआ एक बटे बायाकुल
दोसर बटे ससुरकुल
झांप देले बोहिए जइबइ रे गुइआ दुइओ कुल भोरल नदिआ।
(2)
बेरिआ हो डुबि गेल, झींगा फूल फुटि गेल
गाँथू देवरा झींगा फूल खोंपवें लगाइब हो
गांथिए गुंथिए देवरा भेले समतुल हो
चलू देवरा नाचे जाइब
मन रीझें बयाकुल हो।
(3)
राइबारी राइ बारी, गेलि सरिसा बारी
लागि गेलइ रे, कुसुमी रंग दगिआ
लागि गेलइ
देबउ हो धोबी भइआ
डाला मइर सोनवा धोइए दिहें रे,
कुसुमी रंग दगिआ धोइए दिहें
आगि लगाइए देव डाला भइर सोनवा
नाहि छुटइ रे,
कुसुमी रंग दगिआ नाहिं छुटइ।

इन झुमर गीतों में प्रेम की कोमलता, रिश्तों की चुटकी और जीवन की उल्लासपूर्ण धुन गुँथी हुई है। जो ढोल नगाड़ें माँदर और शहनाई के साथ गाये जाते हैं। समापन करम पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकजीवन की सामूहिक चेतना का उत्सव है। जावा गीतों की करुण पुकार और झुमर गीतों की उल्लासभरी गूँज, दोनों मिलकर इस पर्व को पूर्णता प्रदान करते हैं। दूसरे दिन प्रातः करम डाली को जल में विसर्जन किया जाता है, और इस प्रकार करम पर्व श्रद्धा और आनंद की मिश्रित भाव-धारा में सम्पन्न होता है।

G. Reddy

जी रेड्डी एक अनुभवी पत्रकार हैं, जो निष्पक्ष और सटीक रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। वे "समाचार संध्या" नामक वेब पोर्टल संचालित करते हैं, जो समसामयिक घटनाओं पर गहरी विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग करता है। उनका उद्देश्य समाज को सही और विश्वसनीय जानकारी प्रदान करना है।
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