उपेक्षा के कारण घटा संस्कृत का महत्व : आचार्य लीलेश्वर पांडेय
भुरकुंडा (रामगढ़)। श्री अग्रसेन स्कूल भुरकुंडा में संस्कृत दिवस के अवसर पर शुक्रवार को संस्कृत कौशल अभ्युदय प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। प्रतिभागियों ने गायन कौशल में त्वमेव माता च पिता त्वमेवश् मंत्र के पूरे पाठ का लयबद्ध उच्चारण करने व लेखन कौशल में श्शिक्षा का जीवन में महत्व विषय पर संस्कृत में छह-आठ पंक्तियां लिखने की स्पर्धा में भाग लिया।
अभिजीत राज कुशवाहा, अंकुश कुमार, आराध्या कुमारी, सुनिधि कुमारी, अनिकेत उपाध्याय, आयुष धर्मेंद्र, अनुप्रिया कुमारी, अंजना कुमारी, सौम्या केसरी, मयंक कुमार, सोनाली केसरी, नंदिनी कुमारी, नैंसी कुमारी, गीता कुमारी ने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। इस अवसर पर संस्कृत शिक्षक आचार्य लीलेश्वर पांडेय ने बच्चों को संस्कृत भाषा का महत्व समझाया।
श्री पांडेय ने कहा कि संस्कृत भाषा भारत देश की सबसे प्राचीन भाषा है। प्राचीन ग्रन्थ, वेद आदि की रचना भी संस्कृत में ही हुई थी। यह भाषा बहुत सी भाषाओं की जननी है। महाभारत काल में वैदिक संस्कृत का प्रयोग होता था। लेकिन उपेक्षा के कारण आज संस्कृत भाषा देश की कम बोले जानी वाली भाषा बन गई है।
दीपिका तिवारी ने प्रतिभागियों का उत्साहवर्द्धन करते हुए कहा कि संस्कृत की महत्ता से कोई इनकार नहीं कर सकता है। इस भाषा के अभ्यास से हमें दूसरी भाषा को भी सिखने-बोलने में मदद मिलती है। भारत में संस्कृत दिवस श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन को इसीलिए चुना गया था कि इसी दिन प्राचीन भारत में शिक्षण सत्र की शुरुआत होती थी। आज संस्कृत भाषा का व्यापक प्रचार-प्रसार करने की जरूरत है।


