पास पड़ोस के नदी नाला तालाब घाट आहार में करम डाली का झूमते नाचते हुए विसर्जन किया
रजरप्पा। करमा त्यौहार झारखंड के प्रकृति से जुड़ा हुआ है फसलों की हरियाली और बेहद उपज हर घर के परिवार में समृद्धि और शांति का त्यौहार धूमधाम से हुआ संपन्न इस अवसर पर देर शाम महिलाओं ने झूमते नाचते गाजे बाजे के साथ अपने गांव के नदी नाला तालाब में करम डाली का विसर्जन किया गया करमा पर्व महत्वपूर्ण पर्व है जिसे लोग सभी समाज के लोग एक प्लेटफार्म में मिलकर जुलकर धूमधाम से मनाते हैं करम पर्व प्रकृति और मानव समाज से गहरे संबंध है विशेषकर कृषि से संस्कृति,उर्वरता और पर्यावरण संरक्षण का एक जीवंत उत्सव है।

डॉक्टर कश्यप दिनांक 23 सितंबर को स्थानीय कैथा रामगढ़ के आवासीय होली विजन विद्यालय में छात्र-छात्राओं के समक्ष कर्म के विसर्जन से पूर्व नृत्य करते हुए डॉक्टर कश्यप ने छात्र-छात्राओं को बताया कि इस त्योहार में पूजे जाने वाले जावा (अंकुरित अन्न) और किए जाने वाले झूमर नृत्य का प्रकृति से अत्यंत गहरा सांस्कृतिक और वैज्ञानिक जुड़ाव है। अंकुरित अन्न (जावा) और प्रकृति का संबंध करम पूजा का सबसे मुख्य आकर्षण ‘जावा’ जगाना है, जिसमें कुंवारी कन्याएं नदी की बालू लाकर उसमें सात या नौ प्रकार के अनाज (जैसे चना, मूंग, गेहूं, कुर्थी, धान आदि) बोती हैं।

यह जावा सीधे तौर पर धरती की उर्वरता शक्ति (Fertility) और नई फसल के आगमन का प्रतीक है। जब ये बीज अंकुरित होकर हरे-भरे पौधे बनते हैं, तो यह जीवन के नवसृजन, विकास और प्रकृति के निरंतर चक्र को दर्शाते हैं। किसान जावा के अंकुरण की स्थिति को देखकर आने वाली फसल की गुणवत्ता और पैदावार का अनुमान भी लगाते हैं। इस प्रकार, जावा प्रकृति की सृजन क्षमता का सम्मान करने और कृषि समृद्धि की कामना करने का एक पवित्र माध्यम है।
झूमर नृत्य और प्राकृतिक लय
करम पूजा के दौरान रात भर किया जाने वाला ‘झूमर’ लोकनृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का एक तरीका है। झूमर के गीतों में नदियों, जंगलों, करम वृक्ष, वर्षा और पशु-पक्षियों का सुंदर वर्णन होता है। जब युवा एक-दूसरे का हाथ थामकर मांदर और ढोल की थाप पर कदम मिलाते हैं, तो उनकी नृत्य गति हवा में झूमती पेड़ों की डालियों और बहती नदियों की लहरों की लय का अनुकरण करती है। यह नृत्य सामूहिक एकता और प्राकृतिक जीवनशैली के प्रति सम्मान को दर्शाता है।

करम वृक्ष की पूजा और पर्यावरण संरक्षणजावा और झूमर के साथ-साथ इस पर्व में करम (कदंब) पेड़ की डालियों की पूजा की जाती है। यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही वृक्ष-पूजा का हिस्सा है, जो हमें यह सिखाती है कि मनुष्य का अस्तित्व वनों और वनस्पति पर ही निर्भर है। करम की डाली को शक्ति, समृद्धि और आपदाओं से रक्षा का प्रतीक माना जाता है।
संक्षेप में, करम पूजा में जावा नई पौध और उर्वरता का प्रतीक है, तो झूमर प्रकृति की खुशी का उत्सव है। यह पर्व झारखण्ड और आसपास की जनजातीय व क्षेत्रीय संस्कृति का वह अनूठा उदाहरण है, जो मानव जीवन को प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीने का संदेश देता है। झूमर संपन्न होने के बाद छात्र-छात्राओं के साथ करम का विसर्जन तालाब में कर दिया गया इस अवसर पर विद्यालय के काफी संख्या में छात्र-छात्र उपस्थित रहे जबकि विद्यालय के निदेशक मुकुल प्रसाद और विद्यालय के भारत प्रसाद प्रधानाध्यापक के अलावे अन्य शिक्षक भी उपस्थित रहे।
