रिपोर्ट आरिफ कुरैशी
रामगढ़। रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड के अंतर्गत चोकाद पंचायत के चोपदारू गांव की सुप्रिया देवी (पति प्रकाश महतो) अपने पति और बच्चों के साथ रहती हैं। आज भले ही सुप्रिया देवी के चेहरे पर एक आत्मविश्वास भरी मुस्कान दिखाई देती है, लेकिन कुछ साल पहले तक उनका जीवन ऐसा बिल्कुल नहीं था। समूह से जुड़ने से पहले उनके घर की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय और चिंताजनक थी। परिवार की आय का कोई निश्चित साधन नहीं था, जिसके कारण रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना भी एक बड़ी चुनौती बन गया था। इन आर्थिक तंगियों के बीच सुप्रिया देवी का जीवन घर की चारदीवारी तक ही सीमित था।
उन्हें समाज में बाहर निकलने, लोगों से बात करने या किसी सामाजिक गतिविधि में भाग लेने का कोई अवसर नहीं मिलता था। एक घनी निराशा ने उनके पूरे परिवार को घेर रखा था। सुप्रिया देवी के गांव चोपदारू में साल 2007 से ही स्वयं सहायता समूहों की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन उनके जीवन में असली बदलाव का मोड़ साल 2016 में आया। उस समय ‘झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी’ (जेएसएलपीएस) के तहत एक विशेष अभियान (ड्राइव) चलाया जा रहा था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को संगठित कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना था।
इसी अभियान से प्रेरित होकर सुप्रिया देवी ने भी कदम आगे बढ़ाया और दिनांक 07-02-2016 को गठित ‘राधा महिला मंडल’ से जुडी। इस समूह में कुल 13 सक्रिय सदस्य शामिल है। सुप्रिया देवी ने तय किया कि वह हर सप्ताह 10 रुपये की छोटी सी बचत करेंगी। यह 10 रुपये की साप्ताहिक बचत केवल पैसों का संचय नहीं था, बल्कि सुप्रिया देवी और उनके जैसी कई महिलाओं के सुनहरे भविष्य की मजबूत नींव थी।
समूह में जुड़ने के बाद सुप्रिया देवी ने धीरे-धीरे बैंकिंग और पैसों के लेन-देन को समझना शुरू किया। जब उनका आत्मविश्वास बढ़ा, तो उन्होंने अपने परिवार को गरीबी के दलदल से बाहर निकालने के लिए एक व्यवसाय शुरू करने की योजना बनाई। उन्होंने इसके लिए अपने समूह में 20,000 रुपये के ऋण का प्रस्ताव रखा। समूह के नियमों और आपसी सहमति के आधार पर उन्हें पहली बार में 10,000 रुपये का ऋण मंजूर हुआ।
सुप्रिया देवी ने इस राशि को व्यर्थ नहीं जाने दिया। उन्होंने इस पैसे से बकरी पालन का काम शुरू किया जिसमे एक बकरा और दो बकरियां खरीदी और साथ ही कृषि कार्यों में भी हाथ बंटाना शुरु किया। जेएसएलपीएस के मार्गदर्शन में उन्होंने इस व्यवसाय को सही तरीके से संभालना सीखा। बकरी पालन और खेती के क्षेत्र में सुप्रिया देवी की कड़ी मेहनत रंग लाने लगी। उनके द्वारा पाले गए बकरों और बकरियों की बाजार में अच्छी मांग होने लगी, जिससे उन्हें नियमित रूप से आमदनी होने लगी।
आज सुप्रिया देवी के पास वर्तमान में 16 बकरियां है। अब वह हर महीने बकरी पालन और सब्जी खेती (बोदी, मिर्चा, आलू, बैंगन) से 5,000 से 7,000 रुपये तक की शुद्ध कमाई आसानी से कर लेती हैं। अगर सालाना मुनाफे की बात की जाए, तो वह हर साल कम से कम 80,000 रुपये तक की आय हो रही हैं। इस अच्छी आमदनी ने उनके घर की तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने धीरे-धीरे अपने व्यवसाय की पूँजी को बढ़ाया और घर की तमाम आर्थिक समस्याओं को दूर किया।
इस वित्तीय स्वतंत्रता का सबसे बड़ा लाभउनके बच्चों को मिला; अब उनके बच्चों का पालन-पोषण अच्छे से हो रहा है और वे एक अच्छे स्कूल में गुणवतापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इसके साथ ही, सुप्रिया देवी अब अपने भविष्य के लिए बचत भी कर पा रही हैं। सुप्रिया देवी की यह यात्रा केवल आर्थिक सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनके मानसिक और सामाजिक सशक्तिकरण की भी कहानी है। जो महिला कभी घर से बाहर निकलने में झिझकती थी, आज वह अपने परिवार की मुख्य आर्थिक रीढ़ बन चुकी है। आगे के रास्ते के लिए उनकी योजनाएं और भी बड़ी हैं।
उनका सपना है कि वे आने वाले समय में अपने इस बकरी पालन और कृषि के व्यवसाय को और बड़े पैमाने पर (लार्ज स्केल) ले जाएँ, ताकि वे अपने परिवार को एक बेहद सुरक्षित और समृद्ध जीवन दे सकें। अपनी इस अद्भुत और प्रेरणादायक सफलता के लिए सुप्रिया देवी जेएसएलपीएस (जेएसएलपीएस) को दिल से धन्यवाद देती हैं, जिसने उन्हें और उनके जैसे लाखों ग्रामीण महिलाओं को अंधेरे से निकालकर आत्मनिर्भरता के उजाले में खड़ा किया है।