रिपोर्ट : कृष्णा करमाली।
चितरपुर (रामगढ़)। आषाढ़ शुक्ल एकादशी के पावन अवसर पर शनिवार को देवशयनी एकादशी मनाई गई। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन से भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं, जिसे चातुर्मास कहा जाता है। इसी के साथ विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, उपनयन सहित सभी मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। अब अगले चार माह तक शहनाइयों की गूंज थम जाएगी।

कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी) के दिन भगवान विष्णु के जागने के बाद ही विवाह सहित अन्य शुभ एवं मांगलिक कार्यों की पुनः शुरुआत होगी। इसके साथ ही विवाह का नया सीजन भी आरंभ होगा। धार्मिक मान्यता है कि चातुर्मास के दौरान श्रद्धालु पूजा-पाठ, जप, तप, व्रत और दान-पुण्य जैसे धार्मिक कार्यों में विशेष रूप से संलग्न रहते हैं। इस अवधि में मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन एवं धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी किया जाता है।
वहीं, विवाह समारोहों पर रोक लगने से बैंड-बाजा, टेंट, कैटरिंग, मैरिज हॉल तथा विवाह व्यवसाय से जुड़े लोगों के कामकाज में भी कुछ समय के लिए कमी आ जाती है। रजरप्पा मंदिर के वरिष्ठ पुजारी छोटू पंडा ने बताया कि देवउठनी एकादशी के बाद पुनः शुभ मुहूर्त प्रारंभ होंगे और एक बार फिर विवाह मंडपों में शहनाइयों की गूंज सुनाई देगी। उन्होंने श्रद्धालुओं से चातुर्मास के दौरान धर्म, पूजा-अर्चना, व्रत एवं सत्कर्मों के पालन का भी आग्रह किया।