रजरप्पा। झारखंड की समृद्ध जनजातीय एवं लोक संस्कृति में करम परब (कर्मा) केवल एक धार्मिक या आस्था आधारित त्यौहार नहीं है। यदि हम इसे केवल पौराणिक गाथाओं के चश्मे से परे हटकर देखें, तो यह पर्व वस्तुतः प्राकृतिक विज्ञान, जैव-प्रौद्योगिकी, कृषि विज्ञान, वनस्पति विज्ञान (Botany) और पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) का एक जीवंत एवं वैज्ञानिक सम्मिश्रण है।
झारखंड का पठारी इलाका, यहाँ की मिट्टी और यहाँ के मूलवासियों की जीवनशैली प्राकृतिक चक्रों के साथ पूरी तरह से लयबद्ध रही है। भाद्रपद (भादो) माह के एकादशी को मनाया जाने वाला यह लोकपर्व वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के दृष्टिकोण से एक गहन अनुसंधानात्मक विषय है।
१. कृषि-प्रौद्योगिकी और अंकुरण परीक्षण (Seed Germination & Bio-testing)
करम परब के अनुष्ठानों में सबसे महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक प्रक्रिया है ‘जावा’ (Jawa) जगाना। यह अनुष्ठान परब से लगभग 7 से 9 दिन पूर्व शुरू होता है।
- पारंपरिक विधि: कुंवारी युवतियाँ नदी की साफ बालू (रेत) को टोकरी (डालियों) में भरकर लाती हैं। इसमें 7 या 9 प्रकार के अनाज—जैसे धान, मकई, बाजरा, गेहूं, कुर्थी, उरद, मूंग और चना बोए जाते हैं। इसमें हल्दी जल छिड़का जाता है और प्रतिदिन रात को इसके चारों ओर गाकर इसे अंकुरित किया जाता है।
- वैज्ञानिक आधार: यह प्रक्रिया आधुनिक कृषि विज्ञान के “सीड जर्मिनेशन टेस्ट” (Seed Germination Test) का एक उत्कृष्ट रूप है। मानसून के उत्तरार्ध में, जब खरीफ फसलें खेतों में खड़ी होती हैं और आगामी रबी या रबी-पूर्व बुआई का समय नजदीक आता है, तब जनजातीय किसान यह परीक्षण करते हैं कि उनके पास रखे बीजों की अंकुरण क्षमता (Viability and Vigour) कितनी है।
- मृदा परीक्षण (Soil Chemistry): बालू या नदी की गाद का उपयोग जल-निकासी (Drainage) और नमी बनाए रखने का काम करता है। हल्दी का छिड़काव एक प्राकृतिक एंटी-फंगल और एंटी-बैक्टीरियल एजेंट के रूप में काम करता है, जो बीजों को कवक और संक्रमण से बचाता है। यदि जावा के अंकुरित पौधे (अंकुर) लंबे, पीले और घने उगते हैं, तो यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि आने वाली फसल का उत्पादन समृद्ध होगा।
| जावा का तत्व | पारंपरिक उपयोग | वैज्ञानिक/कृषि-वैज्ञानिक महत्व
नदी की बालू | जावा उगाने का माध्यम | उत्कृष्ट जल निकासी और जड़ विकास हेतु हल्का माध्यम |हल्दी जल | पवित्र जल छिड़काव | प्राकृतिक एंटी-फंगल व एंटी-सेप्टिक बायो-पेस्टिसाइड
| अनाज सम्मिश्रण | 7-9 प्रकार के बीज | बीजों की अंकुरण दर (Germination Rate) की प्रामाणिक जाँच |
| अंकुर का रंग (पीला) | सजावटी एवं शुभ | प्रकाश-संश्लेषण के बिना ‘एटीओलेशन’ (Etiolation) प्रक्रिया का जैविक प्रदर्शन |
२. वनस्पति विज्ञान और एथनो-मेडिसिन (Ecology & Ethnobotany)
करम पूजा का मुख्य केंद्र बिंदु करम वृक्ष (Haldina cordifolia / Adina cordifolia या Nauclea cordifolia) की शाखा का रोपण और पूजन है। झारखंड के एथनो-बोटैनिकल (Ethno-botanical) अध्ययनों से यह बात सिद्ध हुई है कि करम का पेड़ औषधीय गुणों की खान है: - फार्माकोलॉजिकल गुण: करम वृक्ष की छाल, पत्तों और जड़ों में कई तरह के एल्कलॉइड्स (Alkaloids) और फ्लेवोनोइड्स पाए जाते हैं। इसमें एंटी-सेप्टिक, एंटी-इंफ्लेमेटरी (सूजनरोधी), और एंटी-पायरेटिक (बुखार रोधी) गुण होते हैं।
- रोग निवारण: पारंपरिक रूप से करम के पत्तों और छाल का काढ़ा पेचिश (Dysentery), पेट के संक्रमण, घावों को सुखाने और त्वचा संबंधी विकारों में उपयोग में लाया जाता है।
- वृक्ष संरक्षण रणनीति: झारखंड के जनजातीय समाज ने जिस वृक्ष में अत्यधिक औषधीय और पारिस्थिकीय गुण पाए, उसे नष्ट होने से बचाने के लिए “पवित्र वृक्ष” (Sacred Tree) के रूप में धर्म और परंपरा से जोड़ दिया। यह जैव विविधता संरक्षण (Biodiversity Conservation) की एक स्वदेशी तकनीक (Indigenous Knowledge System) है।
३. कीट प्रबंधन और कीट-नियंत्रण (Biological Pest Control)
करम पूजा के समय भाद्रपद (सितंबर) का महीना होता है। यह वह समय है जब झारखंड के खेतों में धान की फसलें लहलहा रही होती हैं और यह मौसम कीट-पतंगों और फफूंद (Fungus) के पनपने के लिए सबसे अनुकूल होता है। - करम की डाल का गाड़ना: पूजा के उपरांत, करम की शाखाओं या उनके टुकड़ों को खेतों के बीचों-बीच गाड़ दिया जाता है।
- जैविक कीट नियंत्रण (Perch Method): खेतों में करम की डालियाँ या टहनियाँ गाड़ने से वे पक्षियों के लिए ‘पर्च’ (बैठने का स्थान) का काम करती हैं। कीटभक्षी पक्षी (जैसे नीलकंठ, ड्रोंगो, कौवे आदि) इन टहनियों पर बैठकर फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़ों, जैसे गांधी बग (Gandhi Bug) और स्टेम बोरर (Stem Borer) को आसानी से देखकर खा जाते हैं। यह बिना किसी रासायनिक कीटनाशक (Chemical Pesticides) के किया जाने वाला सबसे प्रभावी इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट (IPM) है।
- फाइटोनसाइड्स (Phytoncides) का प्रभाव: करम की टहनियों से निकलने वाले प्राकृतिक रासायनिक गंध कई प्रकार के हानिकारक कीटों को दूर भगाने (Insect Repellent) का काम करते हैं।
४. मानव-शरीर क्रिया विज्ञान और मानसिक स्वास्थ्य (Physiology & Social Psychology)
करम परब केवल पौधों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव शरीर और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत वैज्ञानिक है: - उपवास और डिटॉक्सीफिकेशन: इस पर्व में लड़कियाँ निर्जला या फलाहार उपवास रखती हैं। मानसून के मौसम में जब पाचन तंत्र सुस्त होता है और जलजनित बीमारियों का खतरा अधिक होता है, तब यह उपवास शरीर के पाचन तंत्र को विश्राम (Autophagy) देता है और टॉक्सिन्स को बाहर निकालता है।
- अंकुरित अनाज का पोषण: पूजा समाप्त होने के बाद जब ‘जावा’ के अंकुरों को प्रसाद के रूप में लिया जाता है या कानों में धारण किया जाता है, तो इसके सेवन से शरीर को प्रचुर मात्रा में विटामिन C, विटामिन B-कॉम्प्लेक्स, और एंटीऑक्सीडेंट्स मिलते हैं, जो मानसून के बाद शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immunity) को मजबूत करते हैं।
- नृत्य, संगीत और एंडोर्फिन: करम पूजा की पूरी रात अखरा में सामूहिक नृत्य और मांदर की थाप पर लोकगीत गाए जाते हैं। न्यूरोसाइंस के अनुसार, सामूहिक लयबद्ध गतिशीलता (Rhythmic Synchrony) और शारीरिक नृत्य से मस्तिष्क में एंडोर्फिन (Endorphins) और डोपामाइन (Dopamine) जैसे हार्मोन्स का स्राव होता है। यह झारखंड के कठोर परिश्रम करने वाले कृषक समाज के मानसिक तनाव को दूर कर उनमें सामाजिक एकजुटता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
५. पारिस्थितिकी संतुलन और झारखंड का दृष्टिकोण
झारखंड का अर्थ ही है—”झाड़-खंड” (वनों का प्रदेश)। यहाँ की पारिस्थितिकी (Ecology) पूरी तरह से मानसूनी वनों पर आधारित है। - जल संरक्षण और मृदा अपरदन: करम जैसे बड़े पेड़ अपनी व्यापक जड़ों के माध्यम से पठारी क्षेत्रों में मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और भूजल रीचार्ज (Groundwater Recharge) में सहायता करते हैं।
- मौसम परिवर्तन का चक्र: जनजातीय समाज करम पूजा के माध्यम से प्रकृति के फेनोलॉजिकल बदलावों (Phenological Changes)—जैसे फूलों का खिलना, हवा की दिशा, कीटों का आगमन—का अवलोकन करता है। यह अवलोकन पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौसम के पूर्वानुमान और फसल नियोजन में मदद करता रहा है।
करमर परब को यदि केवल एक परंपरा मान लिया जाए, तो यह इसकी महत्ता का अधूरा आंकलन होगा। झारखंड की यह महान परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही एक ऐसी अनौपचारिक वैज्ञानिक प्रयोगशाला (Informal Science Laboratory) है, जिसने आधुनिक पर्यावरण विज्ञान, एग्रोनॉमी और स्वास्थ्य विज्ञान के मूलभूत सिद्धांतों को लोक-संस्कृति के ताने-बाने में पिरोया है।
आधुनिक युग में जहाँ हम पर्यावरण संकट, मृदा क्षरण और कीटनाशकों के दुष्प्रभावों से जूझ रहे हैं, वहीं झारखंड की करम परब हमें यह सिखाती है कि प्रकृति का संरक्षण ही मानव जाति के सतत विकास (Sustainable Development) का एकमात्र मार्ग है। लेखक डॉ सुनील कुमार कश्यप रामगढ़ जिला बुद्धिजीवी मंच अध्यक्ष प्रधानाध्यापक उत्क्रमित मध्य विद्यालय गोविंदपुर मांडू
